Wednesday, July 22, 2015

प्रीत






प्रीत

नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई
प्यार के तराने जगे गीत गुनगुनाने लगे
फिर मिलन की ऋतू  आयी भागी तन्हाई

दिल से फिर दिल का करार होने लगा
खुद ही फिर खुद से क्यों प्यार होने लगा
नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Monday, June 22, 2015

हर बार की तरह ( मुंबई पानी पानी )






हर बार की तरह ( मुंबई पानी पानी )



हर बार की तरह 
इस बार भी इंद्र देव 
मुंबई पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गए 
जीब जंतु पशु पक्षी की प्यास 
लम्बे अंतराल के बाद शांत हो गयी 
तालाब पोखर झील फूल कर 
अपने भाग्य पर इतराने लगे 
मुंबई बालों को पाने पीने के लिए
अब कटौती नहीं सहन करनी पड़ेगी 
हर बार की तरह 
इस बार भी लोगो को परेशानी झेलनी पड़ी 
कुछ लोग ट्रेन  और रस्ते में फँस  गए 
मुंबई के कुछ आधुनिक इलाकें 
हिंदमाता , अंधेरी ,दादर ,परेल , कुर्ला
हर बार की तरह इस बार भी पानी में डूबने लगे 
हर बार की तरह में उस दिन 
मीडिया बाले चर्चा करके 
टी आर पी बटोरने लगे 
हर बार की तरह इस बार भी 
जो लोग घर पर रहे चटकारे लेकर 
ख़बरों का आनंद लेने लगे कि बो बच गए परेशानी से 
हर बार की तरह इस बार भी 
बी एम सी के लोग 
अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने की  कोशिश करते दिखे
आमची मुंबई के लोग भी 
हर बार की तरह परेशान दिखे 
करते  तो क्या करते
स्थानीय लोगों की पार्टी  का ही कब्ज़ा  है
बी एम  सी पर 
काफी समय से 
नाराज हों बो भी अपनों से 
चलो इस बार कुछ नहीं बोलते हैं 
शायद अगले साल 
कुछ सुधार देखने को मिले 
अगले दिनों का इन्तजार करने लगें 

मदन मोहन सक्सेना
 

Thursday, May 28, 2015

मेरी कुछ क्षणिकाएँ








मेरी कुछ क्षणिकाएँ

एक :
संबिधान है
न्यायालय है
मानब अधिकार आयोग है
लोकतांत्रिक सरकार है
साथ ही
आधी से अधिक जनता
अशिक्षित ,निर्धन और लाचार है .

दो:
कृषि प्रधान देश है
भारत भी नाम है
भूमि है ,कृषि है, कृषक हैं
अनाज के गोदाम हैं
साथ ही
भुखमरी,  कुपोषण में भी बदनाम है .


तीन:
खेल है
खेल संगठन हैं
खेल मंत्री है
खेल पुरस्कार हैं
साथ ही
खेलों के महाकुम्भ में
पदकों की लालसा में सौ करोड़ का भारत भी देश है .

मदन मोहन सक्सेना.

Wednesday, May 13, 2015

सपनो में सूरत











सपनो में सूरत

आँखों  में  जो सपने थे सपनों में जो सूरत थी
नजरें जब मिली उनसे बिलकुल बैसी  मूरत थी
जब भी गम मिला मुझको या अंदेशे कुछ पाए हैं
बिठा के पास अपने  उन्होंने अंदेशे मिटाए हैं
उनका साथ पाकर के तो दिल ने ये ही  पाया है
अमाबस की अँधेरी में ज्यों चाँद निकल पाया है
जब से मैं मिला उनसे  दिल को यूँ खिलाया है
अरमां जो भी मेरे थे हकीकत में मिलाया है
बातें करनें जब उनसे  हम उनके पास हैं जाते
चेहरे  पे जो रौनक है उनमें हम फिर खो जाते
ये मजबूरी जो अपनी है  हम उनसे बच नहीं पाते
देखे रूप उनका तो हम बाते कर नहीं पाते
बिबश्ता देखकर मेरी सब कुछ वो  समझ  जाते
आँखों से ही करते हैं अपने दिल की सब बातें


काब्य प्रस्तुति : 
मदन मोहन सक्सेना

Monday, October 7, 2013

मुक्तक (आदत)




 मुक्तक (आदत)

मयखाने की चौखट को कभी मंदिर ना समझना तुम
मयखाने जाकर पीने की मेरी आदत नहीं थी
चाहत से जो देखा मेरी ओर उन्होंने
आँखों में कुछ छलकी मैंने थोड़ी पी थी

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 

Thursday, September 26, 2013

प्यार का बंधन









अर्पण आज तुमको हैं जीवन भर की सब खुशियाँ
पल भर भी न तुम हमसे जीवन में जुदा होना
रहना तुम सदा मेरे दिल में दिल में ही खुदा बनकर
ना हमसे दूर जाना तुम और ना हमसे खफा होना 



अपनी तो तमन्ना है सदा हर पल ही मुस्काओ
सदा तुम पास हो मेरे ,ना हमसे दूर हो पाओ
तुम्हारे साथ जीना है तुम्हारें साथ मरना है
तुम्हारा साथ काफी हैं बाकि फिर  क्या करना है



अनोखा प्यार का बंधन इसे तुम तोड़ ना देना
पराया जान हमको अकेला छोड़ ना देना
रहकर दूर तुमसे हम जियें तो बो सजा होगी
ना पायें गर तुम्हें दिल में तो ये मेरी सजा होगी  





मदन मोहन सक्सेना 

Tuesday, September 24, 2013

परायी दुनिया





परायी  दुनिया


अपना दिल जब ये पूछें की दिलकश क्यों नज़ारे हैं
परायी  लगती दुनिया में बह लगते क्यों हमारे हैं

ना उनसे तुम अलग रहना ,मैं कहता अपने दिल से हूँ
हम उनके बिन अधूरें है ,बह जीने के सहारे हैं

जीबन भर की सब खुशियाँ, उनके बिन अधूरी है
पाकर प्यार उनका हम ,उनसे सब कुछ हारे हैं

ना उनसे दूर हम जाएँ ,इनायत मेरे रब करना
आँखों के बह तारे है ,बह लगते हमको प्यारे हैं

पाते जब कभी उनको , तो  आ जाती बहारे हैं
मैं कहता अपने दिल से हूँ ,सो दिलकश यूँ नज़ारे हैं



मदन मोहन सक्सेना

Monday, September 16, 2013

बिनती


 
बिनती


हे रब किसी से छीन कर मुझको ख़ुशी ना दीजिये 
जो दूसरों को बख्शी को बो जिंदगी ना दीजिये

तन दिया है मन दिया है और जीवन दे दिया
प्रभु आपको इस तुच्छ का है लाखों लाखों शुक्रिया

चाहें दौलत हो ना हो कि पास अपने प्यार हो
प्रेम के रिश्ते हों सबसे ,प्यार का संसार हो

मेरी अर्ध्य है प्रभु आपसे प्रभु शक्ति ऐसी दीजिये
मुझे त्याग करूणा प्रेम और मात्र  भक्ति दीजिये

तेरा नाम सुमिरन मुख करे कानों से सुनता रहूँ
करने को  समर्पित पुष्प मैं हाथों से चुनता रहूँ

जब तलक सांसें हैं मेरी ,तेरा दर्श मैं पाता रहूँ 
ऐसी  कृपा  कुछ कीजिये तेरे द्वार मैं आता रहूँ




प्रस्तुति : 
मदन मोहन सक्सेना

Thursday, September 5, 2013

नज़राना





 


नज़राना


  अपना दिल कभी था जो, हुआ है आज बेगाना
आकर के यूँ चुपके से, मेरे दिल में जगह पाना
दुनियां में तो अक्सर ही ,सभल कर लोग गिर जाते
मगर उनकी ये आदत है कि  गिरकर भी संभल जाना



आकर पास मेरे फिर धीरे से यूँ मुस्काना
पाकर पास मुझको फिर धीरे धीरे शरमाना
देखा तो मिली नजरें फिर नजरो का झुका जाना
ये उनकी ही अदाए  हैं ये  मुश्किल है कहीं पाना



जो बाते रहती दिल में है ,जुबां पर भी नहीं लाना
बो लम्बी झुल्फ रेशम सी और नागिन सा लहर खाना
बो नीली झील सी आँखों में दुनियां का  नजर आना
बताओ तुम दे दू क्या ,अपनी नजरो को मैं नज़राना
 
 


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 

Sunday, September 1, 2013

खुशबुओं की बस्ती




खुशबुओं  की   बस्ती

खुशबुओं  की   बस्ती में  रहता  प्यार  मेरा  है
आज प्यारे प्यारे सपनो ने आकर के मुझको घेरा है
उनकी सूरत का आँखों में हर पल हुआ यूँ बसेरा है
अब काली काली रातो में मुझको दीखता नहीं अँधेरा है

जब जब देखा हमने दिल को ,ये लगता नहीं मेरा है
प्यार पाया जब से उनका हमने ,लगता हर पल ही सुनहरा है
प्यार तो है  सबसे परे ,ना उसका कोई चेहरा है
रहमते खुदा की जिस पर सर उसके बंधे सेहरा है

प्यार ने तो जीबन में ,हर पल खुशियों को बिखेरा है
ना जाने ये मदन ,फिर क्यों लगे प्यार पे  पहरा है

काब्य प्रस्तुति : 
मदन मोहन सक्सेना