Friday, August 28, 2015

आ गया राखी का पर्ब

आ गया राखी का पर्ब


राखी का त्यौहार आ ही गया ,इस  त्यौहार को मनाने  के लिए या कहिये की मुनाफा कमाने के लिए समाज के सभी बर्गों ने कमर कस ली है। हिन्दुस्थान में राखी की परम्परा काफी पुरानी है . बदले दौर में जब सभी मूल्यों का हास हो रहा हो तो भला राखी का त्यौहार इससे अछुता कैसे रह सकता है। मुझे अभी भी  याद है जब मैं छोटा था और राखी के दिन ना जाने कहाँ से साल भर ना दिखने बाली तथाकथित  मुहबोली बहनें अबतरित  हो जातीं थी  एक मिठाई का पीस और राखी देकर मेरे माँ बाबु से जबरदस्ती मनमाने रुपये बसूल कर ले जाती थीं। खैर जैसे जैसे समझ बड़ी बाकि लोगों से राखी बंधबाना बंद कर दी। जब तक घर पर रहा राखी बहनों से बंधबाता  रहा ,पैसों का इंतजाम पापा करते थे  मिठाई बहनें लाती थीं।अब  दूर रहकर राखी बहनें पोस्ट से भेज देती हैं कभी कभी मिठाई के लिए कुछ रुपये भी साथ रख देती हैं।यदि अबकाश होता है तो ज़रा अच्छे से मना लेते है। पोस्ट ऑफिस जाकर पैसों को भेजने की ब्यबस्था  करके ही अपने कर्तब्यों की इतिश्री  कर लेते हैं। राखी को छोड़कर पूरे साल मुझे याद भी रहता है की मेरी बहनें कैसी है या उनको भी मेरी कुछ खबर  रखने की इच्छा रहती है ,कहना बहुत  मुश्किल है . ये हालत कैसे बने या इसका जिम्मेदार कौन है काफी मगज मारी करने पर भी कोई एक राय बनती नहीं दीखती . कभी लगता है ये समय का असर है कभी लगता है सभी अपने अपने दायरों में कैद होकर रह गए हैं। पैसे की कमी , इच्छाशक्ति में कमी , आरामतलबी की आदत और प्रतिदिन के सँघर्ष ने रिश्तों को खोखला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 
अपना अपना राग लिए सब अपने अपने घेरे में
हर इंसान की एक कहानी सबकी ऐसे गुजर गयी


उलझन आज दिल में है कैसी आज मुश्किल है
समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं

पर्व और त्यौहारों के देश कहे जाने वाले अपने देश में  कई ऐसे त्यौहार हैं  लेकिन इन सभी में राखी एक ऐसा पर्व है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को और अधिक मजबूत और सौहार्दपूर्ण बनाए रखने का एक बेहतरीन जरिया सिद्ध हुआ है। राखी को  बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधते हुए उसकी लंबे और खुशहाल जीवन की प्रार्थना करती हैं वहीं भाई ताउम्र अपनी बहन की रक्षा करने और हर दुख में उसकी सहायता करने का वचन देते हैं।

अब जब पारिवारिक रिश्तों का स्वरूप भी अब बदलता जा रहा है  भाई-बहन को ही ले लीजिए, दोनों में झगड़ा ही अधिक  होता है और  वे एक-दूसरे की तकलीफों को समझते कम हैं ।आज  वे अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करते  ज्यादा  मिलते है लेकिन जब भाई को अपनी बहन की या बहन को अपनी भाई की जरूरत होती है तो वह मौजूद रहें ऐसी सम्भाबना कम होती जा रही है.

सामाजिक व्यवस्था और पारिवारिक जरूरतों के कारण आज बहुत से भाई अपनी बहन के साथ ज्यादा समय नहीं बिता पाते ऐसे में रक्षाबंधन का दिन उन्हें फिर से एक बाद निकट लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। लेकिन  बढ़तीं महंगाई , रिश्तों के खोखलेपन और समय की कमी की बजह से  बहुत कम भाई ही अपनी बहन के पास राखी बँधबाने  जा पाते हों . सभी रिश्तों की तरह भाई बहन का रिश्ता भी पहले जैसा नहीं रहा लेकिन राखी का पर्ब  हम सबको सोचने के लिए मजबूर तो करता ही है कि  सिर्फ उपहार और पैसों से किसी भी रिश्तें में जान नहीं डाली जा सकती। राखी के परब के माध्यम से भाई बहनों को एक दुसरे की जरूरतों को समझना होगा और एक दुसरे की  दशा  को समझते हुए उनकी भाबनाओं  की क़द्र करके राखी की महत्ता को पहचानना होगा। अंत में मैं अपनी बात इन शब्दों से ख़त्म करना चाहूगां .




मदन मोहन सक्सेना
मौलिक व अप्रकाशित"

Wednesday, August 12, 2015

जय हिंदी जय हिंदुस्तान


 

जय हिंदी जय हिंदुस्तान मेरा भारत बने महान

गंगा यमुना सी नदियाँ हैं जो देश का मन बढ़ाती हैं
सीता सावित्री सी देवी जो आज भी पूजी जाती हैं


यहाँ जाति धर्म का भेद नहीं सब मिलजुल करके रहतें हैं
गाँधी सुभाष टैगोर तिलक नेहरु का भारत कहतें हैं


यहाँ नाम का कोई जिक्र नहीं बस काम ही देखा जाता है
जिसने जब कोई काम किया बह ही सम्मान पाता है


जब भी कोई मिले आकर बो गले लगायें जातें हैं
जन आन मान की बात बने तो शीश कटाए जातें हैं


आजाद भगत बिस्मिल रोशन बीरों की ये तो जननी है
प्रण पला जिसका इन सबने बह पूरी हमको करनी है


मथुरा हो या काशी हो चाहें अजमेर हो या अमृतसर
सब जातें प्रेम भाब से हैं झुक जातें हैं सबके ही सर.
 


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना




Wednesday, July 22, 2015

प्रीत






प्रीत

नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई
प्यार के तराने जगे गीत गुनगुनाने लगे
फिर मिलन की ऋतू  आयी भागी तन्हाई

दिल से फिर दिल का करार होने लगा
खुद ही फिर खुद से क्यों प्यार होने लगा
नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Monday, June 22, 2015

हर बार की तरह ( मुंबई पानी पानी )






हर बार की तरह ( मुंबई पानी पानी )



हर बार की तरह 
इस बार भी इंद्र देव 
मुंबई पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गए 
जीब जंतु पशु पक्षी की प्यास 
लम्बे अंतराल के बाद शांत हो गयी 
तालाब पोखर झील फूल कर 
अपने भाग्य पर इतराने लगे 
मुंबई बालों को पाने पीने के लिए
अब कटौती नहीं सहन करनी पड़ेगी 
हर बार की तरह 
इस बार भी लोगो को परेशानी झेलनी पड़ी 
कुछ लोग ट्रेन  और रस्ते में फँस  गए 
मुंबई के कुछ आधुनिक इलाकें 
हिंदमाता , अंधेरी ,दादर ,परेल , कुर्ला
हर बार की तरह इस बार भी पानी में डूबने लगे 
हर बार की तरह में उस दिन 
मीडिया बाले चर्चा करके 
टी आर पी बटोरने लगे 
हर बार की तरह इस बार भी 
जो लोग घर पर रहे चटकारे लेकर 
ख़बरों का आनंद लेने लगे कि बो बच गए परेशानी से 
हर बार की तरह इस बार भी 
बी एम सी के लोग 
अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने की  कोशिश करते दिखे
आमची मुंबई के लोग भी 
हर बार की तरह परेशान दिखे 
करते  तो क्या करते
स्थानीय लोगों की पार्टी  का ही कब्ज़ा  है
बी एम  सी पर 
काफी समय से 
नाराज हों बो भी अपनों से 
चलो इस बार कुछ नहीं बोलते हैं 
शायद अगले साल 
कुछ सुधार देखने को मिले 
अगले दिनों का इन्तजार करने लगें 

मदन मोहन सक्सेना
 

Thursday, May 28, 2015

मेरी कुछ क्षणिकाएँ








मेरी कुछ क्षणिकाएँ

एक :
संबिधान है
न्यायालय है
मानब अधिकार आयोग है
लोकतांत्रिक सरकार है
साथ ही
आधी से अधिक जनता
अशिक्षित ,निर्धन और लाचार है .

दो:
कृषि प्रधान देश है
भारत भी नाम है
भूमि है ,कृषि है, कृषक हैं
अनाज के गोदाम हैं
साथ ही
भुखमरी,  कुपोषण में भी बदनाम है .


तीन:
खेल है
खेल संगठन हैं
खेल मंत्री है
खेल पुरस्कार हैं
साथ ही
खेलों के महाकुम्भ में
पदकों की लालसा में सौ करोड़ का भारत भी देश है .

मदन मोहन सक्सेना.

Wednesday, May 13, 2015

सपनो में सूरत











सपनो में सूरत

आँखों  में  जो सपने थे सपनों में जो सूरत थी
नजरें जब मिली उनसे बिलकुल बैसी  मूरत थी
जब भी गम मिला मुझको या अंदेशे कुछ पाए हैं
बिठा के पास अपने  उन्होंने अंदेशे मिटाए हैं
उनका साथ पाकर के तो दिल ने ये ही  पाया है
अमाबस की अँधेरी में ज्यों चाँद निकल पाया है
जब से मैं मिला उनसे  दिल को यूँ खिलाया है
अरमां जो भी मेरे थे हकीकत में मिलाया है
बातें करनें जब उनसे  हम उनके पास हैं जाते
चेहरे  पे जो रौनक है उनमें हम फिर खो जाते
ये मजबूरी जो अपनी है  हम उनसे बच नहीं पाते
देखे रूप उनका तो हम बाते कर नहीं पाते
बिबश्ता देखकर मेरी सब कुछ वो  समझ  जाते
आँखों से ही करते हैं अपने दिल की सब बातें


काब्य प्रस्तुति : 
मदन मोहन सक्सेना

Monday, October 7, 2013

मुक्तक (आदत)




 मुक्तक (आदत)

मयखाने की चौखट को कभी मंदिर ना समझना तुम
मयखाने जाकर पीने की मेरी आदत नहीं थी
चाहत से जो देखा मेरी ओर उन्होंने
आँखों में कुछ छलकी मैंने थोड़ी पी थी

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 

Thursday, September 26, 2013

प्यार का बंधन









अर्पण आज तुमको हैं जीवन भर की सब खुशियाँ
पल भर भी न तुम हमसे जीवन में जुदा होना
रहना तुम सदा मेरे दिल में दिल में ही खुदा बनकर
ना हमसे दूर जाना तुम और ना हमसे खफा होना 



अपनी तो तमन्ना है सदा हर पल ही मुस्काओ
सदा तुम पास हो मेरे ,ना हमसे दूर हो पाओ
तुम्हारे साथ जीना है तुम्हारें साथ मरना है
तुम्हारा साथ काफी हैं बाकि फिर  क्या करना है



अनोखा प्यार का बंधन इसे तुम तोड़ ना देना
पराया जान हमको अकेला छोड़ ना देना
रहकर दूर तुमसे हम जियें तो बो सजा होगी
ना पायें गर तुम्हें दिल में तो ये मेरी सजा होगी  





मदन मोहन सक्सेना 

Tuesday, September 24, 2013

परायी दुनिया





परायी  दुनिया


अपना दिल जब ये पूछें की दिलकश क्यों नज़ारे हैं
परायी  लगती दुनिया में बह लगते क्यों हमारे हैं

ना उनसे तुम अलग रहना ,मैं कहता अपने दिल से हूँ
हम उनके बिन अधूरें है ,बह जीने के सहारे हैं

जीबन भर की सब खुशियाँ, उनके बिन अधूरी है
पाकर प्यार उनका हम ,उनसे सब कुछ हारे हैं

ना उनसे दूर हम जाएँ ,इनायत मेरे रब करना
आँखों के बह तारे है ,बह लगते हमको प्यारे हैं

पाते जब कभी उनको , तो  आ जाती बहारे हैं
मैं कहता अपने दिल से हूँ ,सो दिलकश यूँ नज़ारे हैं



मदन मोहन सक्सेना

Monday, September 16, 2013

बिनती


 
बिनती


हे रब किसी से छीन कर मुझको ख़ुशी ना दीजिये 
जो दूसरों को बख्शी को बो जिंदगी ना दीजिये

तन दिया है मन दिया है और जीवन दे दिया
प्रभु आपको इस तुच्छ का है लाखों लाखों शुक्रिया

चाहें दौलत हो ना हो कि पास अपने प्यार हो
प्रेम के रिश्ते हों सबसे ,प्यार का संसार हो

मेरी अर्ध्य है प्रभु आपसे प्रभु शक्ति ऐसी दीजिये
मुझे त्याग करूणा प्रेम और मात्र  भक्ति दीजिये

तेरा नाम सुमिरन मुख करे कानों से सुनता रहूँ
करने को  समर्पित पुष्प मैं हाथों से चुनता रहूँ

जब तलक सांसें हैं मेरी ,तेरा दर्श मैं पाता रहूँ 
ऐसी  कृपा  कुछ कीजिये तेरे द्वार मैं आता रहूँ




प्रस्तुति : 
मदन मोहन सक्सेना