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Monday, October 7, 2013

मुक्तक (आदत)




 मुक्तक (आदत)

मयखाने की चौखट को कभी मंदिर ना समझना तुम
मयखाने जाकर पीने की मेरी आदत नहीं थी
चाहत से जो देखा मेरी ओर उन्होंने
आँखों में कुछ छलकी मैंने थोड़ी पी थी

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 

Thursday, September 26, 2013

प्यार का बंधन









अर्पण आज तुमको हैं जीवन भर की सब खुशियाँ
पल भर भी न तुम हमसे जीवन में जुदा होना
रहना तुम सदा मेरे दिल में दिल में ही खुदा बनकर
ना हमसे दूर जाना तुम और ना हमसे खफा होना 



अपनी तो तमन्ना है सदा हर पल ही मुस्काओ
सदा तुम पास हो मेरे ,ना हमसे दूर हो पाओ
तुम्हारे साथ जीना है तुम्हारें साथ मरना है
तुम्हारा साथ काफी हैं बाकि फिर  क्या करना है



अनोखा प्यार का बंधन इसे तुम तोड़ ना देना
पराया जान हमको अकेला छोड़ ना देना
रहकर दूर तुमसे हम जियें तो बो सजा होगी
ना पायें गर तुम्हें दिल में तो ये मेरी सजा होगी  





मदन मोहन सक्सेना 

Tuesday, September 24, 2013

परायी दुनिया





परायी  दुनिया


अपना दिल जब ये पूछें की दिलकश क्यों नज़ारे हैं
परायी  लगती दुनिया में बह लगते क्यों हमारे हैं

ना उनसे तुम अलग रहना ,मैं कहता अपने दिल से हूँ
हम उनके बिन अधूरें है ,बह जीने के सहारे हैं

जीबन भर की सब खुशियाँ, उनके बिन अधूरी है
पाकर प्यार उनका हम ,उनसे सब कुछ हारे हैं

ना उनसे दूर हम जाएँ ,इनायत मेरे रब करना
आँखों के बह तारे है ,बह लगते हमको प्यारे हैं

पाते जब कभी उनको , तो  आ जाती बहारे हैं
मैं कहता अपने दिल से हूँ ,सो दिलकश यूँ नज़ारे हैं



मदन मोहन सक्सेना

Monday, September 16, 2013

बिनती


 
बिनती


हे रब किसी से छीन कर मुझको ख़ुशी ना दीजिये 
जो दूसरों को बख्शी को बो जिंदगी ना दीजिये

तन दिया है मन दिया है और जीवन दे दिया
प्रभु आपको इस तुच्छ का है लाखों लाखों शुक्रिया

चाहें दौलत हो ना हो कि पास अपने प्यार हो
प्रेम के रिश्ते हों सबसे ,प्यार का संसार हो

मेरी अर्ध्य है प्रभु आपसे प्रभु शक्ति ऐसी दीजिये
मुझे त्याग करूणा प्रेम और मात्र  भक्ति दीजिये

तेरा नाम सुमिरन मुख करे कानों से सुनता रहूँ
करने को  समर्पित पुष्प मैं हाथों से चुनता रहूँ

जब तलक सांसें हैं मेरी ,तेरा दर्श मैं पाता रहूँ 
ऐसी  कृपा  कुछ कीजिये तेरे द्वार मैं आता रहूँ




प्रस्तुति : 
मदन मोहन सक्सेना

Thursday, September 5, 2013

नज़राना





 


नज़राना


  अपना दिल कभी था जो, हुआ है आज बेगाना
आकर के यूँ चुपके से, मेरे दिल में जगह पाना
दुनियां में तो अक्सर ही ,सभल कर लोग गिर जाते
मगर उनकी ये आदत है कि  गिरकर भी संभल जाना



आकर पास मेरे फिर धीरे से यूँ मुस्काना
पाकर पास मुझको फिर धीरे धीरे शरमाना
देखा तो मिली नजरें फिर नजरो का झुका जाना
ये उनकी ही अदाए  हैं ये  मुश्किल है कहीं पाना



जो बाते रहती दिल में है ,जुबां पर भी नहीं लाना
बो लम्बी झुल्फ रेशम सी और नागिन सा लहर खाना
बो नीली झील सी आँखों में दुनियां का  नजर आना
बताओ तुम दे दू क्या ,अपनी नजरो को मैं नज़राना
 
 


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 

Sunday, September 1, 2013

खुशबुओं की बस्ती




खुशबुओं  की   बस्ती

खुशबुओं  की   बस्ती में  रहता  प्यार  मेरा  है
आज प्यारे प्यारे सपनो ने आकर के मुझको घेरा है
उनकी सूरत का आँखों में हर पल हुआ यूँ बसेरा है
अब काली काली रातो में मुझको दीखता नहीं अँधेरा है

जब जब देखा हमने दिल को ,ये लगता नहीं मेरा है
प्यार पाया जब से उनका हमने ,लगता हर पल ही सुनहरा है
प्यार तो है  सबसे परे ,ना उसका कोई चेहरा है
रहमते खुदा की जिस पर सर उसके बंधे सेहरा है

प्यार ने तो जीबन में ,हर पल खुशियों को बिखेरा है
ना जाने ये मदन ,फिर क्यों लगे प्यार पे  पहरा है

काब्य प्रस्तुति : 
मदन मोहन सक्सेना

Wednesday, August 28, 2013

रहमत





रहमत  
रहमत जब खुदा की हो तो बंजर भी चमन होता 
खुशिया रहती दामन में और जीवन में अमन होता
मर्जी बिन खुदा यारो तो   जर्रा हिल नहीं सकता
खुदा जो रूठ जाये तो मय्यसर न कफ़न होता


मन्नत पूरी करना है खुदा की बंदगी कर लो
जियो और जीने दो खुशहाल जिंदगी कर लो
मर्जी जब खुदा की हो तो पूरे अपने सपने हों
रहमत जब खुदा की हो तो बेगाने भी अपने हों 

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Friday, August 23, 2013

हे ईश्वर



हे ईश्वर
आखिर तू ऐसा क्यूँ करता है अशिक्षित ,गरीब ,सरल लोग
तो अपनी ब्यथा सुनाने के लिए
तुझसे मिलने के लिए ही आ रहे थे
बे सुनाते भी तो भला किस को
आखिर कौन उनकी सुनता ?
और सुनता भी
तो कौन उनके कष्टों को दूर करता ?
उन्हें बिश्बास  था कि तू तो रहम करेगा
किन्तु
सुनने की बात तो दूर
बह लोग बोलने के लायक ही नहीं रहे
जिसमें औरतें ,बच्चें और कांवड़िए भी शामिल थे
जो कात्यायनी मंदिर में जल चढ़ाने जा रहे थे
क्योंकि उनका बिश्बास था कि
सावन का आखिरी सोमवार होने से  शिब अधिक प्रसन्न होंगें।
कभी केदार नाथ में तूने सीधे सच्चें  लोगों का इम्तहान लिया
क्योंकि उनका बिश्बास था कि चार धाम की यात्रा करने से
उनके सभी कष्टों का निबारण हो जायेगा।
और कभी कुम्भ मेले में सब्र की परीक्षा ली
क्योंकि उनका बिश्बास था कि गंगा में डुबकी लगाने से
उनके पापों की गठरी का बोझ कम होगा
उनको  क्या पता था कि
भक्त और भगबान के बीच का रास्ता
इतना काँटों भरा होगा
हे
ईश्वर  
आखिर तू ऐसा क्यों करता है।
उने क्या पता था कि
जीबन के कष्ट  से मुक्ति पाने के लिए
ईश्वर  के दर पर जाने की बजाय
आज के समय में
चापलूसी , भ्रष्टाचार ,धूर्तता का होना ज्यादा फायदेमंद है
सत्य और इमानदारी की राह पर चलने बाले की
या तो नरेन्द्र दाभोलकर की तरह हत्या कर दी जाती है
या फिर दुर्गा नागपाल की तरह
बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
हे ईश्वर
आखिर तू ऐसा क्यों करता है। 



मदन मोहन सक्सेना

Monday, August 19, 2013

ये दुनिया


ये दुनिया

ये पैसों की दुनिया ये काँटों की दुनिया
यारों ये दुनिया जालिम बहुत है
अरमानो की माला मैनें जब भी पिरोई
हमको ये दुनिया तो माला पिरोने नहीं देती..

ये गैरों की दुनियां ये काँटों की दुनिया
दौलत के भूखों और प्यासों की दुनिया
सपनो के महल मैंने जब भी संजोये
हमको ये दुनिया तो सपने संजोने नहीं देती..

जब देखा उन्हें और उनसे नजरें मिली
अपने दिल ने ये माना की हमको दुनिया मिली
प्यार पाकर के जब प्यारी दुनिया बसाई
हमको ये दुनिया तो उसमें भी सोने नहीं देती..

ये काँटों की दुनिया -ये खारों की दुनिया
ये बेबस अकेले लाचारों की दुनिया
दूर रहकर उनसे जब मैं रोना भी चाहूं
हमको ये दुनिया अकेले भी रोने नहीं देती..

ये दुनिया तो हमको तमाशा ही लगती
हाथ अपने   हमेशा निराशा ही लगती
देख दुनिया को जब हमने खुद को बदला
हमको ये दुनिया तो बैसा भी होने नहीं देती...

काब्य प्रस्तुति : 
मदन मोहन सक्सेना

Monday, August 5, 2013

गुनगुनाना चाहता हूँ






गुनगुनाना चाहता हूँ

गज़ल गाना चाहता हूँ ,गुनगुनाना चाहता हूँ
ग़ज़ल का ही ग़ज़ल में सन्देश देना चाहता हूँ
ग़ज़ल मरती है नहीं बिश्बास देना चाहता हूँ
गज़ल गाना चाहता हूँ ,गुनगुनाना चाहता हूँ 
 
ग़ज़ल जीवन का चिरंतन प्राण है या समर्पण का निरापरिमाण है 
ग़ज़ल पतझड़ है नहीं फूलों भरा मधुमास है 
तृप्ती हो मन की यहाँ ऐसी अनोखी प्यास है 
ग़ज़ल के मधुमास में साबन मनाना चाहता हूँ 
गज़ल गाना चाहता हूँ ,गुनगुनाना चाहता हूँ

ग़ज़ल में खुशियाँ भरी हैं ग़ज़ल में आंसू भरे 
या कि दामन में संजोएँ स्वर्ण के सिक्के खरे 
ग़ज़ल के अस्तित्ब को मिटते कभी देखा नहीं 
ग़ज़ल के हैं मोल सिक्कों से कभी होते नहीं 
ग़ज़ल के दर्पण में ,ग़ज़लों को दिखाना चाहता हूँ


गज़ल गाना चाहता हूँ ,गुनगुनाना चाहता हूँ 
ग़ज़ल  दिल की बाढ़ है और मन की पीर है 
बेबसी में मन से बहता यह नयन का तीर है 
ग़ज़ल है भागीरथी और ग़ज़ल जीवन सारथी 
ग़ज़ल है पूजा हमारी ग़ज़ल मेरी आरती 
ग़ज़ल से ही स्बांस की सरगम बजाना चाहता हूँ 
गज़ल गाना चाहता हूँ ,गुनगुनाना चाहता हूँ


प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना

Friday, August 2, 2013

प्यार ही प्यार











प्यार ही प्यार


प्यार रामा में है प्यारा अल्लाह लगे ,प्यार के सूर तुलसी ने किस्से लिखे
प्यार बिन जीना दुनिया में बेकार है ,प्यार बिन सूना सा
रा ये संसार है

प्यार पाने को दुनिया में तरसे सभी, प्यार पाकर के हर्षित हुए हैं सभी
प्यार से मिट गए सारे शिकबे गले ,प्यारी बातों पर हमको ऐतबार है

प्यार के गीत जब गुनगुनाओगे तुम ,उस पल खार से प्यार पाओगे तुम
प्यार दौलत से मिलता नहीं है कभी ,प्यार पर हर किसी का अधिकार है

प्यार से अपना जीवन सभारों जरा ,प्यार से रहकर इक पल गुजारो जरा
प्यार से मंजिल पाना है मुश्किल नहीं , इन बातों से बिलकुल न इंकार है

प्यार के किस्से हमको निराले लगे ,बोलने के समय मुहँ में ताले लगे
हाल दिल का बताने  हम
जब  मिले ,उस समय को हुयें हम लाचार हैं

प्यार से प्यारे मेरे जो दिलदार है ,जिनके दम से हँसीं मेरा संसार है
उनकी नजरो से नजरें जब जब मिलीं,उस पल को हुए उनके दीदार हैं

प्यार जीवन में खुशियाँ लुटाता रहा ,भेद आपस के हर पल मिटाता रहा
प्यार जीवन की सुन्दर कहानी सी है ,उस कहानी का मदन एक किरदार है


मदन मोहन सक्सेना

Wednesday, July 31, 2013

मुक्तक (किस्मत)




मुक्तक (किस्मत)

रोता  नहीं है कोई भी किसी और  के लिए
सब अपनी अपनी किस्मत को ले लेकर खूब रोते हैं
प्यार की दौलत को कभी छोटा न समझना तुम
होते है बदनसीब ,जो पाकर इसे खोते हैं

मुक्तक प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना